Thursday, January 13, 2011

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का (जन्मः1884 ई. देहावसानः1941ई.)
जीवन परिचय 
आर्चाय रामचन्द्र शुक्ल  का जन्म 1884 ई.में बस्ती जनपद के अगोना नामक ग्राम में हुआ। इनके पिता श्री चन्द्रबली  शुक्ल सरकारी कर्मचारी थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा राठ (हमीरपुर)में हुई। इसके पश्चात् इन्होंने मिर्जापुर से हाईस्कुल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद नियमित विद्यालय शिक्षा का क्रम टूट गया। मीरजापुर के ही मिशन कला अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किए। बाद में ‘शुक्ल जी हिन्दी ‘शब्द सागर के सम्पादन में वैतनिक सहायक के रूप में बनारस आ गये। यही पर काशी नागरीक प्रचारिणी सभा के विभिन्न पदों पर कार्य पूरा करते हुए ख्याति प्राप्त की । आपने कुछ दिनों तक हिन्दी प्रचारिणी पत्रिका का सम्पादन भी किया । कोश का कार्य पूरा हो जाने के बाद आप हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गये। बाबू शयामसुन्दर दास के अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् आप  हिन्दू विश्वविद्यालय में ही हिन्दी विभाग के विभागध्यक्ष हो गये सन् 1941 ई. में हृदय गति रूकने से आपका देह वासन हो गया । 
                        प्रस्तुति: शंकर वर्मा। गुरुवार, 13.1. जनवरी 2011

ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से


-                                                               रामधारी सिंह दिनकर
मेरे घर के दाहिने एक वकील रहते हैं,जो खाने पीने में अच्छे हैं दोस्तों को भी खूब खिलाते हैं और सभा सोसाइटियों में भी भाग लेते हैं। बाल बच्चों से भरा पूरा परिवार नौकर भी सुख देने वाले और पत्नी भी अत्यन्त मृदुभाषिणि। भला एक सुखी मनुष्य को और क्या चाहिए। मगर वे सुखी नहीं हैं। उनके भीतर कौन.सा दाह हैइसे मैं भली-भांति जानता हूँ।  दरअहसल उनके बगल में जो वीमा एजेंट हैं उनके विभव की वृद्धि से वकील साहब का कलेजा जलता है। वकील साहब को जो भगवान ने जों कुछ देरखा हैवह उनके लिए काफी नहीं दिखता। वह इस चिन्ता में भुने जा रहे हैं कि काश एजेन्ट कि मोटर उनकी मासिक आय और उसकी तड़क-भड़क मेरी भी हुई होती।
ईष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस हृदय में ईष्या घर बना लेती हैवह उन चीजों से आनन्द नहीं ले उठाता जो उसके पास मौजूद हैंबल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता हैजो दूसरो के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते है। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या आदत से यह लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका अनन्द नहीं लेना और बराबर इस चिंता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिलाएक ऐसा दोष है। जिससे ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भंयकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन रात सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है। और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह  दूसरों को हानि पहुंचाने का ही अपना श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है।
ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है। वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों की निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आखों से गिर जाए और जो स्थान रिक्त उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊगा। 
मगर ऐसा न आज तक हुआ और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दुसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नही कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाए तथा गुणों का विकास करे।
ईर्ष्या का काम जलाना है मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐंसे बहुत से लोगो को जानते होंगे जो  ईर्ष्या और द्वेष की साकार मृर्ति हैं और जो बराबर इस फिक्र में लगें रहते हैं कि कहां सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्राफोफोन बजने लगता हैंऔर वे बड़ी ही होशियारि के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते रहे हैं मानें विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। अगर जरा इतिहास को देखिए और समझने का कोशिश किजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढे़ हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय और शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहां होता ?
चिन्ता को लोग चिता कहते है। जिसे किसी प्रचंड चिंता ने पकड़ लिया हैउस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है। ईर्ष्या शायद फिर चिन्ता से भी बदतर चीज है क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालता है।
मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ हैं बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को ही कुंठित बना देता है। दग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र हैं। किंतु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है जो हर जगह वायु को दूषित करति फिरती है।
ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष ही नहीं हैप्रत्त्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पडती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या का उदय होता हैसामने का सुख उसे मद्धिम सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैंमानो वह देखने के योग्य ही न हों।
आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को बेधकर हंसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर यह हंसी मनुष्य की नहीं राक्षस की हंसी हैयह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है।
ईर्ष्या का एक पक्ष सचमुच ही लाभदायक हो सकता है। जिसके आधीन हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वंद्वी का समकक्ष बनाना चाहता है। किन्तु यह तभी संभव है जबकि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती होवह रचनात्मक हो अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है जो उसके भीतर नहीं है कोई वस्तु हैं,जो दूसरों के पास हैकिन्तु वह नहीं समझा पाता किस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसीमित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है जबकि ये लोग भी अपने अपने से सायद वैसे ही असन्तुष्ट हों।

अपने यही देखा होगा कि शरीफ लोग यह सोचते  हुए सिर खुजलाया करते हैं कि आदमी मुझे क्यों जलता है मैंनें तो उसका कुछ नहीं विगाड़ा और अमुक व्यक्ति इस निन्दा में क्यों लगा सच तो यह है कि मैंने सबसे अधिक भलाई उसीकी की है।
यह सोचते हैं तो मै पाक-साफ हूं मुझमें किसी भी व्यक्ति के लिए दुर्भावना नहीं हैबल्कि अपने दुश्मनों की भी मैं भलाई की सोचा करता हूँ ? फिर ये लोग मेरे पीछे क्यों पडे़ हुए हैंमुझमें कौन सा ऐब है जिसे दुर करके मैं इन दोस्तों को चुप कर सकता हूं 
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब तजुरबे से होकर गुजरेतब उन्होंने एक सूत्र कहा- तुम्हारी निन्दा वही करेगा जिसकी तुमने भलाई की हैं।,,
और नीत्से जब इस कूचे से हो कर निकलता तब उसने जोरों का एक ठहाका लगाया और कहा कि ये तो बजार की मक्खियां हैजो अकारण हमारे चारों ओर भिनभिनाया करती हैं।,,
ये सामने प्रशंसा और पीठ पीछे निन्दा किया करते है। हम इनके दिमाग में बैठे हुए है। ये मक्खियां हमें भुल नहीं सकती और चूंकि ये हमारे बारे बहुत चर्चा करती है। इसलिए हमसे डरती हैंऔर हम पर शंका भी करती है। ये मक्खियां सजा देती हैं हमारे गुणों के लिएऐब को तो माफ कर देती हैक्योंकि बड़ो के लिए ऐब को माफ करने में भी शान है। जिस शान का स्वाद लेने के लिए मक्खियां तरस रहती हैं।
जिनका चरित्र उन्नत हैजिनका हृदय निर्मल और विशाल वे कहते हैंइन बेचारों के बात से क्या चिढ़ना ये तो खुद ही छोटे हैं।
जिनका दिल छोटा हैंऔर दृष्टि संकिर्ण हैवे मानते हैं कि जितनी भी बड़ी हस्तियां हैंउनकी निन्दा ही ठीक हैंऔर जब हम प्रीती उदारता और भलमनसाह का बरताव करते हैं तब भी वे यही समझते है। कि हम उनसे घृणा कर रहे हैऔर हम चाहे जिनका जितना उपकार करें बदले म हमे अपकार ही मिलेगा।
दरअहसल हम जो उनकी निन्दा का जवाब न देकर चुप्पी साधे रहते हैं उसे भी ये हमारा अंकार समझते है। खुशी तो उन्हें तभी हो सकती हैजब हम उनके धरातल पर उतर कर छोटेपन के भागीदार बन जाएं।
सारे अनुभवों को निचोड़कर नीत्से ने एक दूसरा सूत्र कहा-  आदमी में जो गुण महान समझे जाते हैंउन्हीं के चलते,लोग उससे जलते है।
तो ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है नीत्से ने कहा है कि बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकांत की ओर भागो। जो कुछा भी अमर तथा महान हैउनकी रचना और निर्माण बाजार के तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है। जो लोग नए मूल्यों का निमार्ण करने वाले हैं,वे बाजारों में नहीं बसतेवें शोहरत के पास भी नहीं रहते,, जहां बाजार की मक्खियां भी नहीं भनकती वहां एकान्त है।
यह तो हुआ ईर्ष्यालु लोगो  से बचने का उपाय किन्तु ईर्ष्या से आदमी कैसे सकता है ?
 ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है उसे फालतू बातों के बारे में साचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया हैउसकी पुर्ति का रचनात्मक तरीका क्या हैजिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगीउसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा। 
 प्रस्तुति: शंकर वर्मा। गुरुवार, 13.1. जनवरी 2011

Wednesday, December 22, 2010

बुधवार, 22 दिसंबर 2010




बुधवार, 22 दिसंबर 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
दक्षिणायन, शिशिर ऋतु।
बुधवार, 22 दिसंबर 2010



मास : मार्गशीर्ष।
पक्ष : कृष्णपक्ष।
तिथि : प्रतिपदा तिथि सुबह 10 बजकर 15 मिनट तक, इसके बाद द्वितीया तिथि शुरू।
वार : बुधवार।
नक्षत्र : आर्दा नक्षत्र दोपहर 3 बजकर 7 मिनट तक, इसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र की शुरुआत।
योग : ब्रहम योग अर्द्धरात्रि 2 बजकर 9 मिनट तक, इसके बाद ऐंद्र योग शुरू।
करण : कौलवकरण दोपहर 12 बजकर 10 मिनट तक, इसके बाद तैतिलकरण शुरू।
ग्रह स्थिति : चंद्रमा दिनरात मिथुन राशि में संचार करेगा। आज से ही राष्ट्रीय पौष शुरू।
प्रस्तुति: शंकर वर्मा।
बुधवार, 22 दिसंबर 2010

बाल साहित्य के सफलतम साहित्यकार


                                   (1936 जन्म.ई. मृत्युः1990 ई)
   जीवन-परिचय 
बाल साहित्य के सफलतम साहित्यकार जय प्रकाश भारती का जन्म सन् 1936 में उत्तर प्रदेश  के मेरठ नगर में हुआ था ।  इनके पिता श्री रधुनाथ सहाय,एडवोकेट मेरठ के पुराने कांग्रेसी और प्रसिद्ध समाजसेवी थे ।  मेरठ विश्वविद्यलय से बी.एस सी.तक अध्ययन करके आप पिता श्री के पदचिन्हों का अनुकरण करते हुए समाज सेवा में लग गए ।  मेरठ में साक्षरता प्रसार के कार्य में आप का उल्लेखनीय योगदान रहा । कई वर्शों तक इन्होंने निःशुल्क प्रौढ़ रात्रि.पाठशाला का संचालन भी किया । सम्पादन.कला विशारद उपाधि लेकर आपने दैनिक प्रभात तथा नव भारत टाइम्स में पत्रकारिता का व्याहारिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया हिन्दी के पत्रकारिता जगत और किशोरोपयोगी  वैज्ञानिक साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने सराहनीय कार्य के क्षेत्र में इन्होंने सराहनीय कार्य किया ।  सन् 1990 को इस साहित्यकार का निधन हो गया। प्रस्तुति: शंकर वर्मा। बुधवार, 22 ,दिसम्बर 2010 

Saturday, December 18, 2010

सगुण काव्य धारा की श्रीकृष्ण .

                                         जीवन परिचय,
रसखान सगुण काव्य.धारा की श्रीकृष्ण .भक्ति शाखा के कवि थे। इनका नया नाम इब्राहीम था। इनका जन्म सन्1533 ई में पिहानी.हरदोई  (उ.प्र) में हुआ था और इनका बचपन तालुकेदारी माहौल में सुख से व्यतीत हुआ। वे बाल्यावस्था में ही पिहानी से दिल्ली आए और वहां राजतन्त्र से जुड़ गए। सन्.1555.56 के लगभग दिल्ली में भीषण राज.विप्लव और अकाल के कारण कवि का हृदय दुःखी हो गया जिसके कारण ये ब्रजधाम पधारे। इन्होंने दिल्ली से ब्रज आने की कथा इस प्रकार दी है.
देखि गदर हित,साहिबी,दिल्ली नगर मसान।
छिनहिं बादसा.बंस की ठसक छोरि रसखान।।
प्रेम निकेतन श्री वनहिं आइ गोबर्धन.धाम।
लहावो सरन चित चाहि कै,जुगल सरूप लालम।।
राज विप्लव से व्यथित होकर ये गोवर्धन चले आए और वहां अपना जीवन श्रीकृष्ण  के भजन कीर्तन में समर्पित कर दिया तथा इन्हें गोस्वामी विटठ्ल नाथ जी ने दीक्षा दी।
रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे, उसी दिव्य प्रेम के सहारे जीवनयापन करते हुए सन् 1618 ई में गोलोक वासी हुए इनकी समाधि महावन में आज भी विद्यमान है।
  प्रस्तुति: शंकर वर्मा। शुनि वार, 17 दिसम्बर 2010

Friday, December 17, 2010

सुभद्रा कुमारी चौहान



जीवन-परिचय
सुभद्रा जी का जन्म सन् 1904 ई में प्रयाग के निहालपुर नामक मोहल्ले में हुआ था। पिता का नाम ठाकुर रामनाथ सिंह था। क्रास्थवेस्ट कॉलेज में शिक्षा  प्राप्त करते हुए देश  प्रेम से प्रभावित हुईं और स्वतंत्रता-संग्राम में रूचि लेने लगीं। आपका विवाह खण्डवा निवासी ठा-लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ। सुभद्रा जी ने काव्य-रचना के साथ साथ स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण इनको अनेक बार कारावास जाना पड़ा।फिर भी ये राष्ट्रीय विचारों एवं गतिविधियों में संलिप्त रहीं और काव्य रचना करती रहीं। आपका देहावसान सन् 1948 ई0 में हुआ। प्रस्तुति: शंकर वर्मा। शुक्रवार, 17 दिसम्बर 2010

Wednesday, December 15, 2010

बुधवार, 15 दिसंबर 2010


बुधवार, 15 दिसंबर 2010
बुधवार, 15 दिसंबर 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
दक्षिणायन, हेमंत ऋतु।
बुधवार, 15 दिसंबर 2010



मास : मार्गशीर्ष।
पक्ष : शुक्लपक्ष।
तिथि : नवमी तिथि सुबह 11 बजकर 4 मिनट तक, इसके बाद दशमी तिथि शुरू।
वार : बुधवार।
नक्षत्र : उत्तर भाद्रपद नक्षत्र सुबह 10 बजकर 20 मिनट तक, इसके बाद रेवती नक्षत्र की शुरुआत।
योग : व्यतिपात योग सुबह 11 बजकर 52 मिनट तक, इसके बाद वरियान योग शुरू।
करण : कौलवकरण सुबह 11 बजकर 4 मिनट तक, इसके बाद तैतिलकरण शुरू।
ग्रह स्थिति : चंद्र मीन राशि में, सूर्य वृश्चिक राशि में, मंगल धनु में, बुध धनु में, गुरू मीन में, शुक्र तुला में, शनि कन्या राशि में, राहु धनु में और केतु मिथुन राशि में स्थित है।

प्रस्तुति : वीएचवी। शंकर वर्मा । 15 दिसंबर 2010

Friday, November 19, 2010

शुक्रवार, 19 नवंबर, 2010

पर्व त्यौहार
शुक्रवार, 19 नवंबर, 2010
शुक्रवार, 19 नवंबर, 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
दक्षिणायन, हेमंत ऋतु।
शुक्रवार, 19 नवंबर, 2010


मास : कार्तिक।
पक्ष : शुक्ल।
तिथि : त्रयोदशी तिथि रात 9 बजकर 47 मिनट तक, इसके बाद चतुर्दशी तिथि शुरू।
वार : शुक्रवार।
नक्षत्र : अश्विनी नक्षत्र अर्द्धरात्रि के बाद 5 बजकर 40 मिनट तक, इसके बाद भरणी नक्षत्र की शुरुआत।
योग : व्यतिपात योग अर्द्धरात्रि के बाद 5 बजकर 18 मिनट तक, इसके बाद वरियान योग शुरू।
ग्रह स्थिति : चंद्र मेष राशि में, सूर्य वृश्चिक राशि में, मंगल वृश्चिक में, बुध वृश्चिक में, गुरू कुंभ में, शुक्र तुला में, शनि कन्या राशि में, राहु धनु में और केतु मिथुन राशि में स्थित है।

प्रस्तुति : शंकर वर्मा। शुक्रवार, 19 नवम्बर, 2010।

Monday, November 8, 2010

गुरुवार, 04 नवम्बर 2010


गुरुवार, 04 नवम्बर 2010
गुरुवार, 04 नवम्बर 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
रवि दक्षिणायन, हेमंत ऋतु।
गुरुवार, 04 नवम्बर 2010



मास : कार्तिक कृष्ण पक्ष।
तिथि : त्रयोदशी तिथि दोपहर 3 बजकर 57 मिनट तक, इसके बाद चतुर्दशी तिथि शुरू।
वार : गुरुवार।
नक्षत्र : हस्त नक्षत्र दोपहर 3 बजकर 3 मिनट तक, इसके बाद चित्रा नक्षत्र की शुरुआत।
योग : विष्कुंभक योग शाम 6 बजकर 21 मिनट तक, इसके बाद प्रीति योग शुरू।
ग्रह स्थिति : चंद्रमा दिन-रात कन्या राशि में और अर्द्धरात्रि 1 बजकर 56 मिनट पर तुला राशि में प्रवेश करेगा। राहु काल दोपहर 1 बजकर 30 मिनट से 3 बजे तक। वणिजकरण दोपहर 3 बजकर 57 मिनट तक, इसके बाद विष्टिकरण शुरू।

प्रस्तुति: । शंकर  वर्मा। गुरुवार, 04 नवम्बर 2010

Monday, November 1, 2010

मंगलवार, 02 नवम्बर 2010

पर्व त्यौहार
मंगलवार, 02 नवम्बर 2010
मंगलवार, 02 नवम्बर 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
रवि दक्षिणायन, हेमंत ऋतु।
मंगलवार, 02 नवम्बर 2010


मास : कार्तिक कृष्ण पक्ष।
तिथि : एकादशी ।
वार : मंगलवार।
नक्षत्र : पूर्व फाल्गुनी।
योग : ऐंद्र।
ग्रह स्थिति : चंद्रमा दिन-रात सिंह राशि में संचार करेगा।

प्रस्तुति: शंकर वर्मा। मंगलवार, 02 नवम्बर 2010

सोमवार, 01 नवम्बर 2010

पर्व त्यौहार
सोमवार, 01 नवम्बर 2010
सोमवार, 01 नवम्बर 2010 युगाब्द 5112, विक्रम संवत् 2067,
शालिवाहन शक (शक संवत्) 1932,
संवत्सर नाम : शोभन
रवि दक्षिणायन, हेमंत ऋतु।
सोमवार, 01 नवम्बर 2010



मास : कार्तिक कृष्ण पक्ष।
तिथि : दशमी तिथि रात 12 बजकर 48 मिनट तक, इसके बाद एकादशी तिथि शुरू।
वार : सोमवार।
नक्षत्र : मघा नक्षत्र रात 9 बजकर 38 मिनट तक, इसके बाद पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र की शुरुआत।
योग : शुक्ल योग सुबह 8 बजकर 28 मिनट तक, इसके बाद ब्रहम योग शुरू। अर्द्धरात्रि 5 बजकर 19 मिनट के बाद ऐंद्र योग शुरू।
ग्रह स्थिति : चंद्रमा दिन-रात सिंह राशि में संचार करेगा। राहु काल सुबह 7 बजकर 30 मिनट से 9 बजे तक। वणिजकरण दोपहर 2 बजकर 5 मिनट तक, इसके बाद विष्टिकरण शुरू।

प्रस्तुति: शंकर वर्मा। सोमवार, 01 नवम्बर 2010